संजयनगर स्थानीय पुनर्वास प्रोजेक्ट में सकल रूप से जुड़े होने के कारण हम मकान मालिकों के लिए उनके हिस्से की आर्थिक योगदान का हल निकालने में लग गए, जिससे हम कम आय वर्ग के लोगों को लोन न मिल पाने की असुविधाओं से वाकिफ़ हुए। हमारी टीम ने हमारे सामाजिक पार्टनर स्नेहालय और रंग दे नामक संस्था के साथ मिलकर संजयनगर के लोगों के लिए एक होम लोन प्रोडक्ट बनाया। हमारे इस अनुभव को हम दो हिस्सों में आपके साथ शेयर करेंगे। यह दूसरा हिस्सा हमारे टीम के शशांक मित्तल ने लिखा है, जहाँ उन्होंने देश की स्थिति और हमारे संजयनगर में हुए काम का एक संक्षिप्त वर्णन किया है।

 

चुनौतियाँ और कुछ विचार

गरीबों को अपनी सेवाएं उपलब्ध न कराने के कारणों में बैंक्स अक्सर कहते है कि उनके लिए रिस्क और सेवाओं के खर्चे, दोनों बहुत ज़्यादा है। लेकिन साहूकारों के बढ़ते कमाई और MFIs की तरक्की, दोनों ही गरीब वर्ग के लोगों के बल पे हुई है। देखा जाए तो गरीबों के लिए लोन की कीमत कई ज़्यादा है, और इसी वजह से वो अपने किश्त सही समय पे भरने की कोशिश करते है, ताकि अपने गिरवी रखे सम्पति को खो न दे और लेनदारों से अच्छे सम्बन्ध बनाये रख सके। इससे यह साबित होता है कि उन में लोन चुकाने की भरपूर क्षमता है।

संजयनगर के लोगों में भी लोन चुकाने की पूरी क्षमता है। कोविड में कई लोगों ने अपने रोज़गार खोये थे और बहुत कठिंनायियों का सामना किया। लेकिन उनमे से ही कइयों ने लॉकडाउन खुलते ही कमाने के नयी तरीके ढूंढ लिए। यहाँ के ज़्यादातर लोग अभी भी पक्की नौकरी में नहीं है और दिन के हिसाब से काम करते है।

हम लोगों की सहमति से ज़्यादा उनके लोन न चुकाने की इच्छा की गुत्थी नहीं सुलझा पाए है। यह कहना ज़रूरी है कि अप्रैल 2022 तक सभी 27 कर्जदारों ने अपने किश्त चुकाए थे, हालांकि कुछ लोगों ने अपने हालातों के कारण थोड़ी देर लगायी। तो ये समस्या समुदाय के ज़्यादातर लोगों से सम्बंधित नहीं है। हर जगह एक-आद लोन की  भरपाई न करनेवाले लोग मिल ही जाते है और हम इसके लिए तैयार थे। लेकिन इन मुट्ठीभर लोगों का बाकियों के मनोबल पे जो असर होता है, उसे संभालना काफी कठिन साबित हुआ है।

कम ब्याज के अलावा रंग दे के स्कीम में समय पे किश्त न भरने का कोई बड़ा दंड भी नहीं है। लोग आखरी तारीख तक अपने किश्त अपने सहूलियत के हिसाब से भर सकते है। दबाव डालने के लिए कोई एजेंट या गुंडा गल्ली-गल्ली घूमकर उन्हें हड़काने नहीं आता। और सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि इस स्कीम के अंतर्गत लोगों को अपनी सम्पति गिरवी भी नहीं रखनी पड़ती, और उन्हें लोन केवल पार्टनर संस्था के भरोसे के बल पे दी जाती है (हमारे केस में स्नेहालय)

हम बार बार खुद से यही सवाल पूछते है कि हम ऐसा क्या करें (या ऐसा क्या नहीं कर रहे है) की लोग बिना किसी ज़ोर ज़बरदस्ती या दबाव से अपने किश्त ज़िम्मेदारी से भरते रहे?

सभी चुनौतियों के बावजूद हम गर्व से कह सकते हैं कि संजयनगर की पहली बिल्डिंग मार्च 2022 में लोगों को सौंप दी गयी थी। यहाँ के लोगों ने एक दुसरे की जवाबदारी लेते हुए इस बात का ध्यान रखा कि जितने भी लोन के किश्ते कोविड-सम्बंधित परेशानियों के वजह से या जान-बूझ के नहीं भरे गए थे, सभी 100% चूका दिए जाए।

लोगों को आर्थिक संस्थाओं से जोड़ने की असली कीमत

सिर्फ खाता होने या खोल देने से लोग बैंकों की सुविधाओं का फायदा नहीं उठा पाते। सरकारी स्कीम्स, जैसे प्रधान मंत्री जन धन योजना, सरकार की आर्थिक समावेशन (financial inclusion) को राष्ट्रीय नीति के स्तर पर लाने की नीयत ज़ाहिर करती है, पर यह अकेले काफी नहीं।

इसके लिए लोगों को बहुत सारी ट्रेनिंग देनी होगी और उनके साथ व्यावहारिक बदलाव पे काम करना होगा, खासकर ऐसे लोग जिन्होंने कभी बैंक या किसी आर्थिक संस्था के साथ काम न किया हो।

जिन लोगों की कमाई, खर्चे और बचत, तीनो ही दिन के हिसाब से नकद में होती है, उनकी आदतों और सोच में बदलाव लाने के लिए बहुत मदद की ज़रूरत है। और इस स्तर की ट्रेनिंग करने के लिए एक बड़े बजट और साथ में सिखानेवाले लोगों का होना बहुत ज़रूरी है।

आखिर इस खर्चे को उठाने की क्षमता किस में है?

NGO और अन्य संस्थाए जिनका समुदाय के लोगों के साथ एक गहरा, भरोसे का रिश्ता है, वो इस ट्रेनिंग के लिए एक अच्छा ज़रिया बन सकते है। हमारे इस छोटे से लोन प्रोडक्ट से हमें यह समझ में आ गया है कि लोगों को आर्थिक संस्थाओं से जोड़ने की असली कीमत काफी ज़्यादा है, और NGOs के ही मदद से देश में कई लोग अब बैंक्स जैसी संस्थाओं से जुड़ पाए है। स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups (SHGs)) का देश भर में फैलाव इसका एक उद्धरण है।

Affordable Housing Finance Companies (AHFCs) भी कुछ हद तक सस्ते शर्तों पर कम आय वर्ग के लोगों को लोन देने में सफल रहें है, लेकिन लोग यहाँ से लोन लेने के बाद सीधे बैंक्स से लेन-देन कर पाते है। नतीजा यह है कि AHFCs केवल पहली बार लोन लेनेवालों को मदद कर पाते है, और उनके लिए सेवाएं उपलब्ध कराने के खर्चे हमेशा ज़्यादा रहते है।

चाहे कोई सामाजिक संस्था हो या आर्थिक, या कोई और जो लोगों को आर्थिक श्रोतों से जोड़ने के मकसद में लगे हो, इन सभी को अपने प्रोग्राम चलने के लिए खुद आर्थिक मदद की ज़रुरत है। इसका खर्चा पहली बार लोन लेनेवालों के सर पे भारी ब्याज या फीस के रूप में डालना एक बहुत बड़ी ना-इंसाफ़ी है। यह मार्किट की असफलता रही है कि गरीब वर्ग के लोग आज भी बैंकों से जुड़ नहीं पाए है, और इस फासले को दूर करने के लिए जो भी प्रोग्राम ज़रूरी है उन्हें आर्थिक रूप से सपोर्ट करना चाहिए। यह सपोर्ट दान देनीवाली संस्थाओं, कॉर्पोरेट कंपनियों या सब्सिडी के रूप में सरकार से आ सकती है। वरना लोगों को बैंकों से जोड़ने का वादा आज के लाखों से ज़्यादा खाली जान धन खातों पे आके ही ख़तम हो जाएगा।